‘सियासी गिद्ध’ और बेटी की अस्मत: आखिर कब बंद होगा लाशों पर राजनीति का दौर?

​

​खागा (फतेहपुर):

फतेहपुर के खागा में हुई सामूहिक दुष्कर्म की जघन्य घटना ने न केवल कानून-व्यवस्था पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि समाज के उस दोहरे चरित्र को भी नग्न कर दिया है जहाँ संवेदनाओं से ऊपर ‘सियासी नफा-नुकसान’ को रखा जाता है। एक तरफ जहाँ एक परिवार अपनी उजड़ती गरिमा और न्याय की गुहार में सिसक रहा है, वहीं दूसरी तरफ खागा की गलियाँ राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन का अखाड़ा बन गई हैं।

​संवेदना का मुखौटा, वोट की राजनीति

​प्रशासनिक पाबंदियों और धारा 144 जैसे अवरोधों के बावजूद, सफेदपोश नेताओं का लाव-लश्कर कैमरों की चकाचौंध के साथ पीड़िता के द्वार तक पहुँचने की होड़ में लगा है। विडंबना देखिए, ये नेता न्याय की प्रक्रिया में सहायक बनने या पीड़ित परिवार को ढांढस बंधाने के बजाय, कैमरों के सामने अपनी मौजूदगी दर्ज कराने को प्राथमिकता दे रहे हैं।

​जब तक फ्लैश लाइट चमकती है, तब तक सहानुभूति के शब्द सुनाई देते हैं, लेकिन जैसे ही कैमरा हटता है, चर्चा का विषय ‘अगले चुनाव’ और ‘जातीय समीकरण’ बन जाता है। क्या यह न्याय के लिए संघर्ष है, या फिर इसे ‘वोट की फसल’ काटने का एक वीभत्स प्रयास माना जाए?

​प्रशासनिक चुनौती और सियासी बाधाएँ

​वर्तमान में खागा पुलिस और प्रशासन के सामने दोहरी चुनौती खड़ी है:

  1. ​आरोपियों की धरपकड़: पुलिस की कई टीमें फरार आरोपियों की तलाश में दबिश दे रही हैं।
  2. ​VIP प्रबंधन: नेताओं के लगातार दौरों, नारेबाजी और समर्थकों की भीड़ को नियंत्रित करने में प्रशासन की आधी ऊर्जा खर्च हो रही है।

​आश्चर्य की बात यह है कि जो ऊर्जा अपराधियों को सलाखों के पीछे भेजने में लगनी चाहिए थी, वह अब इन ‘सियासी दौरों’ के रूट मैनेजमेंट में लग रही है। जब भी ऐसी कोई घटना होती है, विपक्ष इसे शासन की विफलता बताने में जुट जाता है और सत्ता पक्ष बचाव की मुद्रा में आ जाता है। इस तू-तू-मैं-मैं में वह ‘न्याय’ कहीं पीछे छूट जाता है जिसके लिए वह बेटी तड़प रही है।

​क्या दौरों से भरेंगे घाव?

​समाज के सामने आज कुछ कड़वे सवाल खड़े हैं:

    • ​क्या गाड़ियों के लंबे काफिले और ऊंची आवाज में की गई नारेबाजी से पीड़िता का मानसिक संत्रास कम होगा?
    • ​क्या सोशल मीडिया पर फोटो डालने मात्र से उस परिवार को समाज में खोई हुई गरिमा वापस मिलेगी?
    • ​आखिर क्यों हर बलात्कार और हत्याकांड को जाति और धर्म के चश्मे से देखा जाने लगा है?

​”न्याय में देरी, न्याय न मिलने के बराबर है। लेकिन न्याय की राह में खड़ी की गई राजनीतिक बाधाएं उससे भी बड़ा अपराध हैं।”

 

​निष्कर्ष: संवेदनशीलता की दरकार

​खागा की यह घटना कोई पहली बार नहीं है जब लाशों पर राजनीति की बिसात बिछी हो। हाथरस से लेकर उन्नाव और अब फतेहपुर तक, एक ही पैटर्न दोहराया जा रहा है। समय आ गया है कि राजनीतिक दल आत्मचिंतन करें। जनता को भी यह समझना होगा कि न्याय की लड़ाई शोर-शराबे से नहीं, बल्कि एक जवाबदेह व्यवस्था और त्वरित न्यायिक प्रक्रिया से जीती जाती है।

​जब तक अपराधी को जाति और वोट बैंक के सुरक्षा कवच से बाहर निकालकर केवल एक ‘अपराधी’ के तौर पर नहीं देखा जाएगा, तब तक ऐसी घटनाओं पर सियासत के गिद्ध मंडराते रहेंगे। खागा की बेटी को सहानुभूति नहीं, त्वरित न्याय चाहिए।

India Varta News
Author: India Varta News

Mohit Chakraborty is the Founder and Editor-in-Chief of India Varta News. He is actively involved in journalism and social service from Fatehpur, Uttar Pradesh. His mission is to deliver unbiased, factual, and public-interest journalism while highlighting local, regional, and national issues. He believes that media is a powerful tool for positive social change.

Leave a Comment