बाकरगंज किले के पीछे अलीगंज तालाब को पाटने की साजिश; मुराईन टोला और महिला डिग्री कॉलेज के पीछे भी सिमटा तालाबी रकबा
फतेहपुर। जिले में भू-माफियाओं और रसूखदारों के हौसले इस कदर बुलंद हैं कि अब वे सरकारी जमीनों के साथ-साथ सुरक्षित तालाबी नंबरों को भी डकारने में लगे हैं। हैरान करने वाली बात यह है कि इन छुटभैया ब्रोकरों को कथित रूप से ‘सत्ता का संरक्षण’ प्राप्त है, जिसके चलते जिला व तहसील प्रशासन भी रसूखदारों का नाम आते ही बैकफुट पर नजर आता है। ताजा मामला कस्बा फतेहपुर उत्तरी के बाकरगंज क्षेत्र का है, जहां किले के पीछे अलीगंज स्थित एक बड़े तालाब पर अवैध कब्जे का खेल धड़ल्ले से शुरू हो गया है।
कूड़ा-कचरा और मिट्टी डालकर तालाब की पुराई शुरू
प्राप्त जानकारी के अनुसार, कस्बा फतेहपुर उत्तरी बाकरगंज (किले के पीछे अलीगंज) में स्थित गाटा संख्या 655 जो कि तालाबी नंबर में दर्ज है, उसकी करीब 0.4450 हेक्टेयर (लगभग 2 बीघा 15 बिस्वा) बेशकीमती जमीन पर भू-माफियाओं की नजर गड़ चुकी है। मुराईन टोला की तर्ज पर ही यहां भी प्लाटिंग करने वाले ब्रोकरों ने रात के अंधेरे और दिन के उजाले में तालाब के अंदर कूड़ा, कचरा और मिट्टी डालकर पुराई (पाटने का काम) शुरू कर दी है। स्थानीय लोगों का कहना है कि सत्ताधारियों के वरदहस्त के कारण ये ब्रोकर अब जमीन तो जमीन, अंबर तक बेचने के सपने देख रहे हैं।
मुराईन टोला में 3 बीघा तालाबी नंबर दबा, महिला डिग्री कॉलेज के पीछे भी कब्जा
भू-माफियाओं की कारस्तानियों का यह कोई पहला मामला नहीं है। कस्बा फतेहपुर दक्षिणी के गाटा संख्या 1817 के करीब 16 बीघा के बड़े रकबे पर प्रशासन अभी पूरी तरह अपना कब्जा ले भी नहीं पाया था कि मुराईन टोला में हो रही नई प्लाटिंग में तालाबी नंबर के करीब 3 बीघा हिस्से को अवैध रूप से शामिल कर लिया गया।
यही हाल फतेहपुर दक्षिणी स्थित महिला डिग्री कॉलेज के पीछे का है। यहां फतेहपुर उत्तरी, पूर्वी और दक्षिणी क्षेत्र के मिलन बिंदु पर स्थित एक विशाल तालाब को भू-माफियाओं ने चारों तरफ से घेर लिया है। तालाब के बड़े हिस्से को पाटकर या तो प्लाटिंग कर दी गई है या फिर उसकी तैयारी चल रही है, जिसके कारण यह जलस्रोत लगातार सिकुड़ता जा रहा है।
“राम-राज” में माफिया बने शागिर्द!
एक तरफ जहां आम जनता महंगाई और प्रशासनिक भ्रष्टाचार की दुश्वारियों से त्रस्त है, वहीं सत्ताधारी दल के कुछ नेताओं की छत्रछाया में पल रहे ये जमीन माफिया मलाई काट रहे हैं। कभी गैर-भाजपा सरकारों में जिन्हें भू-माफिया और गुंडा कहकर चिन्हित किया जाता था, आज वही सफेदपोशों के शागिर्द बनकर सरकारी और बंजर जमीनों को ठिकाने लगा रहे हैं।
प्रशासनिक इच्छाशक्ति पर उठे सवाल
तहसील और जिला प्रशासन एक तरफ अवैध कब्जों पर कार्रवाई का दावा करता है, लेकिन जैसे ही किसी रसूखदार या सत्ता से जुड़े नेता का नाम सामने आता है, कार्रवाई की रफ्तार सुस्त हो जाती है। कार्रवाई की जद से महफूज रहने के कारण ही इन माफियाओं के हौसले सातवें आसमान पर हैं।
अब देखना यह होगा कि क्या जिला प्रशासन बाकरगंज किले के पीछे अलीगंज में मौजूद इस बेशकीमती तालाबी रकबे को भू-माफियाओं के चंगुल से बचा पाता है, या फिर यह सरकारी संपत्ति भी रसूख की भेंट चढ़ जाएगी?








