रिपोर्ट: राहुल द्विवेदी, कानपुर ब्यूरो चीफ
कानपुर। औद्योगिक नगरी कानपुर में कानून-व्यवस्था बनाए रखने वाली पुलिस खुद असुरक्षित नजर आ रही है। बीते 15 दिनों के आंकड़ों पर नजर डालें तो पुलिसकर्मियों पर हमले की 7 बड़ी वारदातें सामने आई हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि इन हमलों के पीछे कोई खूंखार अपराधी नहीं, बल्कि मामूली कार्रवाई से नाराज आम नागरिक और नशेड़ी शामिल हैं।
वर्दी पर भारी पड़ रही ‘नौटंकी’
कानपुर में हालात यह हो गए हैं कि पुलिस को अब बदमाशों से ज्यादा सड़क पर चलने वाले सिरफिरों से डर लगने लगा है। कहीं दरोगा को कुचलने की कोशिश की जा रही है, तो कहीं सिपाही की वर्दी फाड़कर उसे दौड़ा-दौड़ाकर पीटा जा रहा है। इन घटनाओं ने न केवल खाकी की साख पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि यह भी दर्शाया है कि लोगों के मन से कानून का खौफ खत्म होता जा रहा है।
अप्रैल 2026: हमलों की खौफनाक टाइमलाइन
23 अप्रैल (कैंट): शुक्लागंज गंगापुल पर ट्रैफिक TSI रमेश कुमार सरोज को इनोवा सवार ने कुचलने का प्रयास किया।
21 अप्रैल (घंटाघर): चालान कटने से बौखलाए टेंपो चालकों ने पुलिस बूथ को निशाना बनाया और पथराव कर शीशे तोड़ डाले।
20 अप्रैल (बिठूर): चेकिंग के दौरान दरोगा प्रदीप सिंह पर गाड़ी चढ़ाने की कोशिश हुई, जिसमें एक मासूम कारोबारी की जान चली गई।
19 अप्रैल (हर्ष नगर): डायल 112 के कांस्टेबल धीरेंद्र कुमार का सिर फोड़ा गया और सरेआम वर्दी फाड़ दी गई।
11 अप्रैल (नरवल): ग्राम पाली में पुलिस टीम पर हमला कर चौकी फूँकने की धमकी दी गई।
क्यों बढ़ रही है पुलिस के प्रति असहिष्णुता?
जानकारों का मानना है कि नशे की बढ़ती लत, छोटी-छोटी बातों पर उग्र होना और कानून के लचीलेपन का फायदा उठाना इन हमलों की मुख्य वजह है। ट्रैफिक नियमों का पालन कराने या शांति व्यवस्था बनाए रखने के दौरान पुलिसकर्मी सीधे जनता के निशाने पर आ रहे हैं।
पुलिस की कार्रवाई
हालांकि, इन सभी 7 मामलों में पुलिस ने तत्परता दिखाते हुए मुकदमे दर्ज किए हैं और आरोपियों को सलाखों के पीछे भेजा है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या सिर्फ गिरफ्तारी से वर्दी का इकबाल कायम रह पाएगा? पुलिस प्रशासन को अब अपनी कार्यप्रणाली और सुरक्षा के प्रति ठोस रणनीति बनानी होगी।








