रिपोर्ट: राहुल द्विवेदी, ब्यूरो चीफ, कानपुर।
कानपुर। कहते हैं कि विधाता ने दुनिया में अपनी कमी पूरी करने के लिए ‘माँ’ को बनाया है। जबलपुर के बरगी डैम से जो मंजर सामने आया, उसने इस कहावत को हकीकत की स्याही से अमर कर दिया। 15 घंटे के लंबे रेस्क्यू ऑपरेशन के बाद जब पानी की गहराइयों से वह डूबी हुई नाव बाहर निकली, तो वहां मौजूद पत्थर दिल इंसान भी रो पड़ा।
काल के गाल में भी ढाल बनी रही ममता
रेस्क्यू टीम ने जैसे ही नाव के भीतर प्रवेश किया, वहां का दृश्य देख सबकी सांसें थम गईं। जब मौत सामने खड़ी थी और चारों ओर अंधेरा और पानी का शोर था, उस आखिरी क्षण में भी माँ ने खुद को बचाने की जगह अपने मासूम बच्चे को बाहों के घेरे में कैद कर रखा था। पानी की प्रचंड लहरें भी माँ के उस आंचल को बच्चे से जुदा नहीं कर सकीं।
तस्वीर जो बिना बोले बहुत कुछ कह गई
नाव के भीतर का वह मंजर चीख-चीख कर गवाही दे रहा था कि एक माँ का प्रेम दुनिया के हर डर और स्वार्थ से ऊपर है।
अंतिम संघर्ष: जब नाव पलट रही होगी, तब उस माँ ने अपनी जान की परवाह किए बिना बच्चे को सीने से सटा लिया होगा।
अटूट बंधन: लहरों का दबाव और मौत का खौफ भी उस सुरक्षा घेरे को नहीं तोड़ पाया जो एक माँ ने अपने बच्चे के लिए बनाया था।
नदियाँ हार गईं, माँ की ममता जीत गई
प्रकृति के इस क्रूर प्रहार ने भले ही उन दोनों की सांसें छीन ली हों, लेकिन माँ के त्याग ने काल को हरा दिया। यह घटना समाज को झकझोर देने वाली है कि इस पूरी सृष्टि में ‘माँ’ से बड़ा कोई सुरक्षा कवच नहीं है। वह मरते दम तक अपने बच्चे के लिए ढाल बनी रही।
“लहरें शरीर को डुबो सकती हैं, लेकिन उस ममता को नहीं, जो अंतिम सांस के साथ अमर हो गई।”
इस दिव्य ममता और महान माँ के बलिदान को पूरा शहर अश्रुपूरित नेत्रों से नमन कर रहा है। ईश्वर दिवंगत आत्माओं को शांति प्रदान करे।








