असोथर/फतेहपुर।
प्रशासनिक संरक्षण और खाकी की शह पर फलने-फूलने वाले अवैध धंधों की फेहरिस्त में अब असोथर थाना क्षेत्र का बेसंडी गांव भी सुर्खियों में आ गया है। स्थानीय ग्रामीणों के गंभीर आरोपों ने पुलिस और आबकारी विभाग की कार्यशैली को कटघरे में खड़ा कर दिया है। आरोप है कि गांव के ही एक रसूखदार यादव परिवार द्वारा खुलेआम अवैध शराब की मंडी चलाई जा रही है, और इस काले कारोबार को स्थानीय पुलिस का कथित वरदहस्त प्राप्त है।
“कोई मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकता…” – आखिर किसके दम पर है इतनी हनक?
क्षेत्र में यह चर्चा आम है कि पुलिस और आबकारी विभाग की कथित मिलीभगत के चलते शराब माफिया के हौसले सातवें आसमान पर हैं। दबंगई का आलम यह है कि गांव के गरीब, मजलूम और कमजोर वर्ग के लोगों को डरा-धमकाकर चुप करा दिया जाता है।
सूत्रों के मुताबिक, यह कोई पहला मामला नहीं है। इससे पहले भी इस शराब माफिया ने पुलिसिया धौंस का इस्तेमाल कर गांव की एक बेसहारा विधवा महिला और उसके परिवार को बुरी तरह प्रताड़ित किया था। ग्रामीण बताते हैं कि आरोपी सरेआम चुनौती देते हुए कहता है:
“जिसको जो करना हो कर ले, पुलिस और आबकारी मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकती।”
माफिया की इस खुली चुनौती ने प्रशासन के इकबाल पर गंभीर सवालिया निशान लगा दिए हैं, जिससे स्थानीय जनता में भारी आक्रोश और खौफ का माहौल है।
पुख्ता वीडियो साक्ष्य होने का दावा, घिरेगा तंत्र!
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा मोड़ तब आया जब खोजी सूत्रों ने दावा किया कि बेसंडी गांव में चल रहे इस अवैध शराब नेटवर्क के पुख्ता वीडियो साक्ष्य (Video Proof) जुटा लिए गए हैं। इन वीडियो के सामने आने के बाद अब स्थानीय थाने और आबकारी टीम के पास पर्दा डालने का कोई रास्ता नहीं बचेगा।
अधिकारियों के वही रटे-रटाए जवाब: ‘शिकायत मिलेगी तो करेंगे कार्रवाई’
जब इस गंभीर मामले को लेकर जिम्मेदार अधिकारियों से जवाब तलब किया गया, तो उनके बयान हमेशा की तरह औपचारिकता से घिरे नजर आए:
रमाशंकर सरोज (थाना प्रभारी, असोथर):
“मामला अभी मेरे संज्ञान में नहीं है। अगर कोई शिकायत आती है, तो जांच कराकर आवश्यक कानूनी कार्रवाई की जाएगी।”
रमेश कुमार (आबकारी इंस्पेक्टर):
“बेसंडी गांव में शराब की किसी भी दुकान का कोई लाइसेंस अलॉट नहीं है। अगर वहां अवैध बिक्री हो रही है, तो छापेमारी कर सख्त से सख्त कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी।”
बड़ा सवाल: क्या सिर्फ कागजी साबित होगी जांच?
जब आबकारी इंस्पेक्टर खुद मान रहे हैं कि गांव में कोई वैध दुकान नहीं है, और सूत्रों के पास वीडियो साक्ष्य मौजूद हैं, तो फिर स्थानीय पुलिस इस धंधे से अनजान कैसे रह सकती है? क्या उच्चाधिकारी इस मामले का संज्ञान लेकर दोषियों और उन्हें संरक्षण देने वाले कर्मियों पर हंटर चलाएंगे, या फिर यह मामला भी ‘जांच’ की फाइलों में दफन हो जाएगा?








