खागा, धाता और हथगांम नगर पंचायत में ईओ देवहुती पांडे का ‘एकछत्र राज’, टेंडरों में चल रहा करोड़ों का बंदरबांट।
बाजार कीमत से चार गुना ऊंचे दामों पर हो रही है सरकारी खरीद; चहेते ठेकेदारों के साथ साहबों की ‘पार्टनरशिप’ की चर्चा आम।
फतेहपुर। जिले की नगर पंचायतों में इस समय विकास के नाम पर सरकारी धन को पानी की तरह बहाया जा रहा है। खागा, धाता और हथगांम नगर पंचायत में नियम-कायदों को ताक पर रखकर ‘कमीशनखोरी’ का ऐसा खेल चल रहा है, जिसने भ्रष्टाचार के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। इन तीनों निकायों की कमान संभाल रहीं अधिशाषी अधिकारी (ईओ) देवहुती पांडे के रसूख के आगे उच्चाधिकारियों से लेकर स्थानीय जनप्रतिनिधि तक बेबस नजर आ रहे हैं। हालात यह हैं कि बाजारू कीमत से कई गुना अधिक दामों पर टेंडर पास कराकर चहेते ठेकेदारों की जेबें भरी जा रही हैं।
घोटाले के ‘स्पेशल’ नमूने: आंकड़ों की बाजीगरी
सरकारी फाइलों में विकास की जो चमक दिखाई जा रही है, उसकी जमीनी हकीकत हैरान करने वाली है। टेंडरों में तय की गई कीमतें और बाजार की वास्तविक दरों में जमीन-आसमान का अंतर है:
हाथ कूड़ा गाड़ी (ठेला): जिस हाथ ठेले की बाजार में कीमत महज ₹4,000 से ₹5,000 है, उसे नगर पंचायत द्वारा ₹13,400 प्रति नग की दर से खरीदा जा रहा है। कुल 160 नगरों के लिए ₹21,44,000 का भारी-भरकम टेंडर जारी कर दिया गया।
कान्हा गौशाला कंपोस्ट पिट: खागा स्थित गौशाला में 12 कंपोस्ट पिट (गड्ढे) बनाए जाने हैं। तकनीकी जानकारों के मुताबिक, एक पिट ₹50 से ₹60 हजार में आसानी से बनकर तैयार हो सकता है (यानी कुल खर्च करीब ₹6 लाख)। लेकिन इसके लिए ₹23,55,686 का टेंडर निकाला गया है, यानी एक गड्ढे की कीमत करीब ₹2 लाख तय की गई है।
ई-रिक्शा गार्बेज: बाजार में हाइड्रोलिक सिस्टम वाला ई-रिक्शा ₹90,000 से ₹1,50,000 के बीच मिल जाता है। मगर यहाँ 5 ई-रिक्शा के लिए ₹15,74,950 (यानी ₹3 लाख से ऊपर प्रति रिक्शा) का बजट ठिकाने लगाया जा रहा है।
बैकहो लोडर (JCB): ₹30-35 लाख में मिलने वाली मशीन का टेंडर ₹41,45,000 में निकाला गया है।
साहब की मर्जी से चलती है सरकार; अध्यक्ष भी बेबस
स्थानीय सूत्रों की मानें तो इन नगर पंचायतों में ईओ की ‘तूती’ बोलती है। वह कब दफ्तर आती हैं और कब जाती हैं, यह कोई नहीं जानता। कई जगह तो स्थिति ऐसी है कि नगर पंचायत अध्यक्षों की एक नहीं चलती, वहीं कुछ जगहों पर अध्यक्ष और अधिकारियों के बीच ’36 का आंकड़ा’ है। इसके बावजूद, अपनी ऊंची सेटिंग के दम पर अफसर सभी को सुपरसीड कर मनमाने फैसले ले रहे हैं।
पार्टनरशिप का ‘सुपर गेम’
गलियारों में चर्चा आम है कि नगर पंचायतों में सिर्फ उन्हीं बाहरी और चुनिंदा ठेकेदारों को काम दिया जाता है, जो तयशुदा मोटा कमीशन एडवांस टेबल पर रख देते हैं। कुछ मामलों में तो अधिकारियों और अध्यक्षों की इन ठेकेदारों के साथ सीधे तौर पर बेनामी पार्टनरशिप होने की बात भी सामने आ रही है।
पेजल से लेकर सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट तक में ‘सेंध’
सिर्फ गाड़ियां या गड्ढे ही नहीं, बल्कि रेन वाटर हार्वेस्टिंग, पेयजल योजनाओं, फ्रीजर टैंकर, वाटर वेंडिंग मशीन और आरओ सिस्टम लगाने के नाम पर भी बजट को जमकर लूटा जा रहा है। अफसर इस कदर बेफिक्र हैं कि उन्हें शासन-प्रशासन की जांच का कोई खौफ नहीं है।
बड़ा सवाल: आखिर जांच करेगा कौन?
कमोबेश यही हाल फतेहपुर जिले की अन्य नगरपालिका परिषदों और नगर पंचायतों का भी है। सरकारी तिजोरी में लगी इस दीमक की कहानी से सूबे के आला अफसर या तो अनजान बने हुए हैं या फिर जानबूझकर आंखें मूंदे बैठे हैं। अगर इस पूरे मामले की निष्पक्ष और उच्च स्तरीय तकनीकी जांच कराई जाए, तो करोड़ों रुपये का टेंडर घोटाला उजागर होना तय है। लेकिन बड़ा सवाल यह उठता है कि बिल्ली के गले में घंटी बांधेगा कौन और इस महालूट पर लगाम कब लगेगी?








