नई दिल्ली: भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में एक बड़ा और भावुक फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को ‘राइट टू डाई’ (Right to Die) यानी गरिमा के साथ मृत्यु की अनुमति दे दी है। इसके साथ ही हरीश राणा देश के पहले ऐसे व्यक्ति बन गए हैं, जिन्हें पैसिव यूथेनेशिया (Passive Euthanasia) के तहत लाइफ सपोर्ट हटाने की मंजूरी मिली है।
हादसे ने बदल दी थी दुनिया
यह दुखद कहानी साल 2013 से शुरू हुई थी। हरीश राणा एक हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिर गए थे। इस भीषण हादसे में उनके सिर पर गंभीर चोटें आईं, जिसके बाद वह कोमा में चले गए। पिछले 11 वर्षों से हरीश बिस्तर पर थे और उनकी हालत में रत्ती भर भी सुधार नहीं हुआ।
माता-पिता की लंबी कानूनी लड़ाई
हरीश के बुजुर्ग माता-पिता ने अपने बेटे को इस असहनीय पीड़ा में देखते हुए अदालत का दरवाजा खटखटाया था। उन्होंने दलील दी थी कि उनके बेटे के बचने की कोई उम्मीद नहीं है और उसे इस तरह मशीन के सहारे जीवित रखना उसकी गरिमा के खिलाफ है। माता-पिता ने ‘राइट टू डाई’ के तहत गुहार लगाई थी कि हरीश को शांति और सम्मान के साथ अंतिम विदाई देने की अनुमति दी जाए।
सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला
मामले की गंभीरता और मेडिकल रिपोर्ट्स को देखते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने अब हरीश का लाइफ सपोर्ट सिस्टम हटाने की अनुमति दे दी है। कोर्ट ने माना कि जब जीवन केवल मशीनों पर निर्भर हो और सुधार की कोई संभावना न हो, तो व्यक्ति को गरिमा के साथ मृत्यु का अधिकार है।
क्या है पैसिव यूथेनेशिया?
इसमें मरीज का इलाज या लाइफ सपोर्ट (जैसे वेंटिलेटर या फीडिंग ट्यूब) रोक दिया जाता है, ताकि प्रकृति अपना काम कर सके और मरीज को लंबी पीड़ा से मुक्ति मिल सके।
महत्व
यह फैसला भारत में इच्छामृत्यु और ‘लिविंग विल’ (Living Will) से जुड़े कानूनों के क्रियान्वयन की दिशा में एक मील का पत्थर साबित होगा। यह उन परिवारों के लिए एक मिसाल है जो अपने प्रियजनों को ‘वेजिटेटिव स्टेट’ (Vegetative State) में तड़पता देख रहे हैं।








